मंगलवार, 1 जून 2010

लिटिल चेम्प --- नेत्रहीन बालक दिवाकर के नाम एक पाती

उस दिन
सरगम की दुनिया में,
नन्हें सितारों के बीच,
जीत का परचम उठाये
मैंने
तुम्हे देखा था दिवाकर .....

सुरों में डूबते उतराते उसी गीत की मानिंद
काश
तुम भी देख पते
दिवाकर
मौसम की अदला बदली..........
रंगो की इन्द्रधनुषी छटा,
अपने हमनाम को
आकाश में चमकते....

देख पाते-
पापा की आँखों में
बेटे की मुस्कुराहतो पर
हजारों हज़ार जन्मों के
सार्थक होने का संतोष,
और
माँ के गालों पर
अविरत बहते ...निशब्द आंसू .....

तुम्हें उसी
सार्थक संतोष,निशब्द आंसू और
अगणित आशीषों की
सौगंध है दिवाकर,
कि तुम उन आँखों के लिए
कभी मत रोना
जो औरों के पास है....

क्योंकि जागती आँखों में भी
महसूस करने की
वो ताकत नहीं होती
जो तुम्हारी
सोयी आँखों में है..........

हाँ मुझे यकीन है दिवाकर
तुम बहुत बड़े बनोगे,
इतने कि-
तुम्हारी छाया में
खड़े रहेंगे,
हजारो हज़ार दिवाकर एक दिन,
तुम सुनोगे
अपने ही गीत
देख पाओगे
उनकी आँखों से
मौसम की अदला बदली.......

3 टिप्‍पणियां:

  1. तुम बहुत बड़े बनोगे,
    इतने कि-
    तुम्हारी छाया में
    खड़े रहेंगे,
    हजारो हज़ार दिवाकर एक दिन,
    तुम सुनोगे
    अपने ही गीत
    देख पाओगे
    उनकी आँखों से
    मौसम की अदला बदली.......


    अच्छी रचना .....स्वागत है .....!!

    आपकी प्रोफाइल पूर्ण नहीं है उसे पूर्ण करें .....!!

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  2. तुम्हारी छाया में
    खड़े रहेंगे,
    हजारो हज़ार दिवाकर एक दिन,
    तुम सुनोगे
    अपने ही गीत

    वाह कुंदा जी सुंदर रचना ।

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  3. आप सच मै एक सुन्दर रचनाकार हैं दोस्त आपके लिखे शब्द दिल तक दस्तक देते हैं !

    बहुर सुन्दर उत्साहवर्धक रचना !

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