सोमवार, 31 मई 2010

मैं नदी हूँ

मैं नदी हूँ ..............
अनवरत प्रवाहित
एक नदी
जानती हूँ,
सीमाओं में बहना ,
और
वक्त पड़े तो
चट्टानों को काटकर
अपने रास्ते बना लेना भी..........

मैं समयदर्शिका हूँ ,
याद है मुझे
अपने परिभ्रमण की
दिशाएं ,
और तुम जानते हो
समय रुका नहीं है
कभी
किसी पल के लिए भी..........

मैं चिंगारी हूँ,
आता है मुझे
राख के ढेर में
दबे रहकर भी
अपनी आस्था को बचाए रखना,
आने वाले
किसी भी
ज्वालामुखी की खातिर ...........

मैं कंचन हूँ,
झेला है मैंने
तप कर
कुंदन बनने का संघर्ष ,
कुंदन
यूँ ही नहीं होता,
अनमोल या
चमक से परे ...........

मैं बेटी हूँ
जानती हूँ,
गिरते ही रहेंगे
अनगिनत उल्कापिंड ,
मेरे जन्म से
महाप्रयाण तक के
सफ़र में ,
लेकिन
आशीष है न बुजुर्गों के ,
झेलूंगी सहर्ष ,
जब तक हूँ ...............

मैं स्त्री हूँ ,
जननी भी
समेटे हूँ गर्भ में,
समूची सृष्टि ,
तुम मारना चाहते हो मुझे?
तो मारो....
लेकिन याद रखो -
जितना मुझे मारोगे
उतना खुद खत्म हो जाओगे .............


क्योंकि मैं
सृष्टि हूं,
मैं हूँ .....सृष्टि है .....
.सृष्टि है........तुम हो.....
तुम हो ......मैं हूँ....

मैं नदी हूं...जानती हूं, सीमाओं में बहना....

2 टिप्‍पणियां:

  1. क्योंकि मैं
    सृष्टि हूं,
    मैं हूँ .....सृष्टि है .....
    .सृष्टि है........तुम हो.....
    तुम हो ......मैं हूँ....
    बहुत सुंदर । नारी के स्वभिमान और अस्मिता का अद्भुत दर्शन ।

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