सोमवार, 31 मई 2010

सुनो अहिल्या

इतिहास साक्षी है अहिल्या ,
बेगुनाह थीं तुम,
सहेज नहीं सकी
स्वयं को ,
अस्मिता पर लगते
ग्रहण से,
बना दी गयीं शिला,
और झेलती रही
बेजुबान होने  का दर्द
आजन्म .....निशब्द ...........

तुम्हे हैरानी होगी अहिल्या
गर मैं कहूँ,
कि तुम शिला बनी,
और तुमने
मुक्ति का इंतजार भी किया.........

हाँ अहिल्या,
शिला बनी तुम
क्योंकि तुम जानती थी
तुम्हारी दुनिया में
कहीं....कोई....रामहै..........
....
सुन सको-
तो सुनो अहिल्या..
इस युग में
आज भी कहीं कहीं,
अहिल्या
इन विषमताओं में
जीती है,
उम्र के
किसी भी मोड़ पर हो,
एक औरत होने का दुःख
सहती है...........

फिर वह
घर में हो, खेत में हो, या कि रेल में,
उम्र में
चार हो ,चौदह हो ,
चौबीस  या चवालीस,
अक्षत कुमारी हो
या सौभाग्य संस्कारित ,
आज भी
अस्मिता के संघर्ष  में
हज़ार हज़ार आंसू रोंती है,
आज भी
अपनी बेगुनाही के साक्ष्य
ढूँढती रह जाती है...................

वह चाहकर भी
शिला नहीं बनती है,
वह मुक्ति का इंतजार
नहीं करती है ,
वह जूझती है
ताउम्र...
खुद से, समाज से,
और शिला होती जा रही इस
समूची सभ्यता से..............

हाँ अहिल्या सुनो....
इक्कीसवी सदी में अहिल्या
शिला नहीं बनती है
इक्कीसवीं सदी में अहिल्या...
मुक्ति का
इंतज़ार नहीं करती है,
वो जानती है,
उसकी दुनिया में
कही... कोई ....राम...नहीं है................

3 टिप्‍पणियां:

  1. अहिल्या के बहाने आपने नारी की स्थिति का मार्मिक चित्रण किया है ।

    उत्तर देंहटाएं
  2. यह मुझे बहुत प्रिय है…विचार और लय से संपृक्त एक अच्छी कविता

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत मार्मिक किन्तु सुन्दरता से लिखी सशक्त रचना !
    छापे की त्रुटियाँ कुछ हैं ,जिन्हें देख लें और सुधार दें !
    शुभकामनायें !

    उत्तर देंहटाएं