शनिवार, 26 अप्रैल 2014

 लघु कथा 

                                               
                                                    संदूकची 


              साब साब हमाई बात सुन लियो साब .......पीछे से दरबान घबराया सा दाखिल हुआ ^ सर सर मैंने बहुत रोका साब, मानती नहीं, मुझे धकेल कर आ गयी ....ऐ चल बाहर निकल...^
उसने फिर उसे ढेल दिया.....हम नै जा रए साब ....तुम्हाये आदमी आदमी हमे बो संदूकची उठा ले आये साब.....
अबकी बार साहब ने दरबान को हाथ के इशारे से रोकने की कोशिश की ......^जाओ तुम बाहर
और उसकी और मुखातिब हुए ..^हाँ बोलो कौन ले करगया तुम्हारी संदूकची ?
तभी दो तीन कर्मचारी और एक अधिकारीनुमा शख्स आये थे ...अपनी बात रखने .....^सरएक्चुअली हुआ ये की कल जो मदाखलत दस्ता गया था शहर में, किसी दूकान के बाहर रखे सामान के साथ उठा लाया शायद ....तभी से लड़ाई झगड़े पर आमादा है ये भिखारन ......
^नै साब हम नै मांगे भीख ...हम तो जो मिले सोई खा लेत .जेई चोर हेंगे...हमें हमाई संदूकची दिबाये डॉ साब 
कलेक्टर साहब का दिल पसीजा ...आखिर आस पास बैठे मेहमानो के बीच इज्जत जो रखनी थी .
^अरे सुनो .....उधर स्टोर में कोई पुराना बॉक्स पड़ा हो तो दे दो इसको ...और ये लो कुछ खा लेना ....
वह फिर बिफरी .....नई साब हमें जिन दिखाओ जे लोट ....हमें नई चईये....हमें तो हमाई बारी संदूकची दिबाओ 
अब कलेक्टर साहब का पारा सातवे आसमान पर पहुंच गया ^ क्या बकबक लगा राखी है जो मिल रहा है लो और जाओ यहाँ से. ये नई चईये वो नई चईये .....ऐसा कौन सा खजाना था तुम्हारी सन्दूक में ?
उसकी रुलाई विलाप में बदल गयी ..^ नई साब खजाना नई ,,,,,,बो तरों की साल ठण्ड ते हमाओ चार सार को मोड़ा मर गओ हतो ..बा खेम बोट माँगबे एक भोत बड़े नेता आये हते, बिन्ने हमाये मोड़ाए गोदी में उठाओ हतो .सो दूसए दिना फ़ोटू आओ हतो अखबार में 
बो फ़ोटू धरो और बाकी कछु खिलौना हेंगे साब. अब हमाओ मोड़ा नैया तो बो संदूकची तो दिबा दो साब .......हमें तो हमाई बारी संदूकची चाइयेगी ......
कहती वह कलेक्टर साहब को पैरो पर गिर गयी थी

2 टिप्‍पणियां:

  1. कुन्दा जी लघुकथा अच्छी है बस एक बार और पढिये तब और भी अच्छी होजाएगी ।

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  2. इस टिप्पणी को एक ब्लॉग व्यवस्थापक द्वारा हटा दिया गया है.

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